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मेहदी हसन : एक आवाज़ की कहानी — साइकिल की दुकान से ग़ज़ल के तख़्त तक

मेहदी हसन : एक आवाज़ की कहानी — सरल श्रद्धांजलि | CYBER COPS India
श्रद्धांजलि विशेष · सरल संस्करण

मेहदी हसन

एक आवाज़ की कहानी
18 जुलाई 1927 — लूणा, राजस्थान  ·  13 जून 2012 — कराची

यह कहानी है राजस्थान के एक छोटे-से गाँव के लड़के की — जो कभी साइकिलें सुधारता था, और फिर ऐसा गाया कि दुनिया ने उसे “ग़ज़ल का बादशाह” मान लिया।

कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें समझने के लिए संगीत सीखना ज़रूरी नहीं। बस सुनिए — और दिल ख़ुद समझ जाता है। मेहदी हसन साहब की आवाज़ ऐसी ही थी। यह लेख उन्हीं की सीधी-सादी कहानी है — बिना भारी-भरकम शब्दों के, वैसे ही जैसे कोई अपना किसी अपने को कहानी सुनाता है। (और अगर आप संगीत की गहराई में उतरना चाहें, तो इसी विषय पर हमारा विस्तृत 30-भाग का संदर्भ-ग्रंथ भी उपलब्ध है — link नीचे मिलेगा।)

गाँव का एक लड़का

साल 1927। राजस्थान के झुंझुनू ज़िले का एक छोटा-सा गाँव — लूणा। यहीं 18 जुलाई को एक बच्चे का जन्म हुआ, नाम रखा गया मेहदी हसन। घर में संगीत पीढ़ियों से चला आ रहा था — कहते हैं, उनके ख़ानदान में सोलह पीढ़ियों से लोग गाते आए थे। पिता और चाचा दोनों माने हुए गायक थे।

तो बचपन से ही घर में सुर गूँजते थे। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में लगे रहते हैं, उस उम्र में मेहदी हसन गाना सीख रहे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि रेत के इन धोरों के बीच पल रहा यह बच्चा एक दिन करोड़ों दिलों पर राज करेगा।

जब सब कुछ छूट गया

1947 में देश का बँटवारा हुआ। लाखों परिवारों की तरह मेहदी हसन का परिवार भी उजड़ गया — सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा। उम्र थी क़रीब बीस साल।

नई जगह, ना पहचान, ना पैसा। पेट पालने के लिए गाना नहीं, काम चाहिए था। तो ग़ज़ल के होने वाले बादशाह ने पहले एक साइकिल की दुकान पर काम किया। फिर मोटर और ट्रैक्टर मैकेनिक बने। सोचिए — जो हाथ आगे चलकर तानपूरे के तारों पर जादू करने वाले थे, वे बरसों तक औज़ार और गिरीस में सने रहे।

पर एक चीज़ उन्होंने कभी नहीं छोड़ी — रियाज़, यानी रोज़ गाने का अभ्यास। दिन भर मेहनत-मज़दूरी, और शाम को गाना। बरसों तक यही चला। इसी ज़िद ने आगे की पूरी कहानी लिखी।

रेडियो से घर-घर तक

1957 में मेहनत रंग लाई — रेडियो पाकिस्तान पर गाने का मौक़ा मिला। धीरे-धीरे लोग इस नई आवाज़ को पहचानने लगे। और फिर 1964 में वह गीत आया जिसने सब कुछ बदल दिया — फ़िल्म ‘फ़रंगी’ की ग़ज़ल “गुलों में रंग भरे”। यह इतनी पसंद की गई कि मेहदी हसन रातों-रात बड़ा नाम बन गए।

वैसे ग़ज़ल क्या होती है? आसान भाषा में — ऐसे शेर, जो गाए जाएँ। दो-दो पंक्तियों में दिल की बात। मेहदी हसन की ख़ूबी यह थी कि वे ग़ज़ल को इतने ठहराव और इतनी मिठास से गाते थे कि मुश्किल-से-मुश्किल शेर भी सीधे दिल में उतर जाता। इसके बाद के बीस-पच्चीस साल उनके नाम रहे — फ़िल्मों में सैकड़ों गीत, देश-विदेश में महफ़िलें, और इनाम-सम्मान की झड़ी।

वो गीत जो शायद आपने भी सुने हैं

नाम भले याद न हों, धुनें आपने ज़रूर सुनी होंगी — किसी पुरानी रात के रेडियो पर, किसी की car में, या किसी reel के background में:

रंजिश ही सही
रूठे हुए को मनाने की सबसे ख़ूबसूरत ग़ज़ल — इनकी सबसे मशहूर रचना
गुलों में रंग भरे
वही गीत जिसने इन्हें सितारा बनाया (1964)
अब के हम बिछड़े
जुदाई का दर्द — जिसने भी किसी को खोया है, उसे छू जाएगी
ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं
भारत में भी बेहद मशहूर फ़िल्मी गीत
रफ़्ता रफ़्ता वो मेरी
धीरे-धीरे किसी के अपना बन जाने की कहानी — शादियों की favourite
प्यार भरे दो शर्मीले नैन
कोमल, मीठा प्रेम-गीत — पहली बार सुनने वालों के लिए बढ़िया शुरुआत

कहाँ से शुरू करें? — 5 गीतों की आसान playlist

  1. प्यार भरे दो शर्मीले नैन (सबसे आसान, सबसे मीठा प्रवेश-द्वार)
  2. रंजिश ही सही (इनकी पहचान — आराम से, आँखें बंद करके सुनिए)
  3. ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं (गुनगुनाने लायक़)
  4. अब के हम बिछड़े (जब अकेले हों और मन भारी हो)
  5. गुलों में रंग भरे (अंत में वह गीत, जहाँ से सब शुरू हुआ)

एक ज़रूरी बात — इन गीतों के बोल यहाँ जान-बूझकर नहीं लिखे गए हैं (copyright का सम्मान)। पर YouTube या किसी भी music app पर नाम खोजिए, आवाज़ ख़ुद बाक़ी बातें कह देगी।

भारत से कभी न टूटा रिश्ता

पाकिस्तान में नाम कमाया, पर जन्मभूमि भारत से रिश्ता कभी नहीं टूटा। वे कई बार भारत आए, यहाँ की महफ़िलों में गाया, और भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया (1979 में जालंधर में के. एल. सहगल पुरस्कार)। राजस्थान का नाम आते ही उनकी आँखें भर आती थीं।

लता मंगेशकर जी ने उनके बारे में कहा था — ऐसा लगता है जैसे उनके गले में भगवान बोलते हैं। — लता मंगेशकर (भावानुवाद)

और इसी रिश्ते की सबसे प्यारी निशानी — 2010 में, जब ख़ां साहब बहुत बीमार थे, उन्होंने लता जी के साथ एक duet गाया: “तेरा मिलना”। कमाल की बात यह कि दोनों कभी studio में साथ नहीं बैठे — ख़ां साहब ने अपना हिस्सा कराची में गाया, लता जी ने अपना भारत में। सरहद जो न मिलने दे, सुर वहाँ भी मिल जाते हैं।

अलविदा — पर सिर्फ़ कहने को

ज़िंदगी के आख़िरी बरस मुश्किल रहे। 1980 के दशक के आख़िर से तबीयत बिगड़ने लगी — फेफड़ों की बीमारी, फिर लकवे के हमले। वह आवाज़ धीरे-धीरे ख़ामोश होती गई जिसने करोड़ों को सुकून दिया था। 13 जून 2012 को कराची में उन्होंने दुनिया छोड़ दी।

पर क्या सचमुच छोड़ी? आज भी हर रोज़, दुनिया के किसी न किसी कोने में, कोई पहली बार “रंजिश ही सही” सुन रहा होता है — और वहीं ठहर जाता है। जगजीत सिंह से लेकर आज के गायकों तक, सबने माना कि ग़ज़ल गाना मेहदी हसन को सुनकर ही सीखा जाता है। जो कलाकार लोगों के रोज़ के सुख-दुख का हिस्सा बन जाए, वह मरा करता ही नहीं।

1927

राजस्थान के लूणा गाँव में जन्म

1947

बँटवारा — परिवार सहित पाकिस्तान; साइकिल दुकान और मैकेनिक का काम

1957

रेडियो पाकिस्तान से पहली पहचान

1964

‘गुलों में रंग भरे’ — रातों-रात शोहरत

1979

भारत में के. एल. सहगल पुरस्कार

2010

लता जी के साथ ‘तेरा मिलना’ — बीमारी में भी सुरों का चमत्कार

2012

13 जून — कराची में विदाई; पर आवाज़ आज भी हमारे साथ

सुर कभी मरते नहीं।
वे बस एक गले से निकलकर
करोड़ों दिलों में बस जाते हैं।
मेहदी हसन · 1927 — 2012 · और उसके बाद अनंत काल तक

दो शब्द, दिल से

18 जुलाई को ख़ां साहब की जयंती मनाई जाती है — यह छोटा-सा लेख उसी दिन की मेरी श्रद्धांजलि है। मैं उनकी गायकी का पुराना क़द्रदान हूँ; थके-हारे दिनों में उनकी आवाज़ ने मुझे बार-बार सँभाला है। आपसे बस इतनी गुज़ारिश है — आज रात, सोने से पहले, उनका कोई एक गीत सुन लीजिएगा। बस एक। बाक़ी काम वह आवाज़ ख़ुद कर देगी।

लेखक : Neelabh Rai
ASCL CCCI · BSI CLIP ISO 27701:2019 & GDPR · CQI/IRCA ISO 27001:2022 LA · ISO 42001:2023 LI · IRCA ISO 22301 LA · TISAX LA/LI (TÜV SÜD) · Diploma in Indian Cyber Law (Govt. Law College Mumbai) · B.Tech IT (AKGEC UPTU) · Fellow IETE · EC Member IETE Noida · Founder CYBER COPS India · 11+ Years GRC
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